Tuesday, November 21, 2017

हम तुमसे न कुछ कह पाये
तुम हमसे न कुछ कह पाये .......
कुछ रिश्तों का सफर खामोशी से ही शुरू होता है और वो सन्नाटा हमेशा के लिये लकीर बन जाता है। ऐसा नहीं है के हम एकदूसरे को कुछ कहना या सुनना नहीं चाहते है, लेकिन कहीं किसी के जज्बात आहात न हो जाये उस ड़र से वो अनचाही चुप्पी हमेशा बरकरार रहती है। क्योंकि जो मिला है वो भी मुश्किल से मिला है कहीं कुछ कहने सुनने में हम एक अच्छा साथी न खो दे! और ये भी हो सकता है दोनों के तार एक ही जगह जुड़े हो लेकिन मज़िल एक न होने से रास्ते अलग अलग चुन लेते है। नदी के वो दो किनारे बनकर रह जाते है जो साथ होते हुए भी कभी एकदूसरे से मिल नहीं पाते और बीच में एहसास की दास्तां पानी बनकर बहती रहती है। कभी कभी दिल बैठ सा जाता है, "लगता है ड़र ये, बात ये दिल की, दिल में न रह जाये.... हम तुमसे न कुछ कह पाये, तुम हमसे न कुछ कह पाये...."

कभी कभी यूँ खामोश निगाहों से एकदूसरे को बड़ी जिजक के साथ बताने की कोशिश करते है, "तुम सुनो गौर से क्या कह रहा है समां, हमनशी छेड़ दो चाहत भरी दास्तां...." और जैसे कहाँ के दिल के तार जुड़े होते हो तो इशारें ट्यूनिंग सेट कर ही लेती है। आंखों से बयाँ भी हो जाता है और आंखों से ही इज़हार भी हो जाता है और फिर आंखों से ही जज्बात भी निकल जाते है, "इतने दिनों तक कुछ ना बताये, तुम हमकों तड़पाये.... हम तुमसे न कुछ कह पाये, तुम हमसे न कुछ कह पाये...."

कुछ रिश्तों के धागे ऐसे ही होते है, जो न एकदूसरे से जुड़े होते है नाही एकदूसरे से जुदा, न उसमें कभी गाँठ लगानी पड़ती है न खींचकर धागा लंबा करना होता है...... यूँही बेज़ुबान सी कहानी चलती रहती है जिसमें कहना सुनना कुछ नहीं होता बस मेहसूस करना होता है!
-YJ

Saturday, November 11, 2017

संग तेरे फिर जीना है उम्रभर

तेरी तलाश को अपना मुकाम बना लूँ ....

फिर जरा मैं भी जी लूँगा ....,

तेरी चाहत को अपना विश्वास उढ़ा दूँ ...

फिर जरा मैं भी जी लूँगा ....,

तेरी सोच को अपने शब्दों में ढ़ाल लूँ ...

फिर जरा मैं भी जी लूँगा ....,

तेरे आँचल में अपनी दुनिया बसा लूँ ...

फिर जरा मैं भी जी लूँगा ....,

तेरी रूह में खुद को उतार लूँ ...

संग तेरे फिर , जी भर जियूँगा ....

उम्र भर

Friday, November 10, 2017

नया कदम

लिखना फिर से शुरू करना ऐसा है जैसे कोई पिंजड़े से किसी बेबस पंछी का आज़ादी की उड़ान की तरफ पहला पंख फैलाना... आज मैं भी इतने सालो बाद फिर इस  आगंन मैं अपनी शब्दो के साथ शुरू करना चाहती हूँ।

Tuesday, July 14, 2015





मैै और तुम्हारी यादे...

एक ही तकिये पर सोते हैं इकठ्ठा हो कर....

...पल ...



लिख दे मेरा अगला जनम उस के नाम ए खुदा..


इस जनम मै मोहब्बत थोड़ी कम पड़ गई हैं.....।



कही फिसल ना जाओ , जरा संभल कर रहना....

मौसम बारिश का है... और मोहब्बत का भी...

...पल...